भारत,अमेरिकी राष्ट्रपति और सुरक्षा व्यय

भारत,अमेरिकी राष्ट्रपति और सुरक्षा व्यय

 -हरिवंश-

समृद्ध पंरपरा भले ही न रही हो या लंबा अतीत-इतिहास का अभाव रहा हो, पर अमेरिकी बनानेवालों ने अपने सपनों की बुनियाद डाली है, वह बुनियाद पग-पग पर है, व्हाइट हाउस में अमेरिका के राष्ट्रपति रहते है, दिल्ली या पटना में एक-एक सांसद-विधायक के जो बड़े भव्य बंगले है. अहाते है (मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों को छोड़ दें), उनके मुकाबले व्हाइट हाउस बहुत छोटा है चौतरफा लोहे की छड़ों के गेट है, अंदर बंगले के गेट पर दो सुरक्षाकर्मी तैनात है, बाथरूम है, इसी में राष्ट्रपति के रहने के सूट है कोई भी यात्री अंदर आ जा सकता है.

कोई बड़ा तामझाम -रोकटोक नहीं है, बगल में ही राष्ट्रपति का कार्यालय है, ओवल हाउस.ओवल हाउस के हरे लॉन पर कैमरे रखे है, ढंके हुए पता चलता है कि राष्ट्रपति शाम में कार्यालय से निकल कर यहां आ जाते है, खड़े-खड़े अखबारनवीशों को संबोधित करते है. इस कारण टीवी कैमरे वगैरह वहीं स्थायी तौर पर रख दिये है, अखबार या टेलीविजन वालों ने व्हाइट हाउस के बगल में विशालकाय भवन है, अमेरिका के उपराष्ट्रपति का कार्यालय राष्ट्रपति से काफी बड़ा कैथरीना फोर्ड बताती है कि कुछ ही दिनों पहले यात्रियों का एक दल व्हाइट हाउस आया था. छड़ से सटे फूलों के बाग में देखा तो दंग रह गया . राष्ट्रपति क्लिंटन फूलों की बागवानी कर रहे थे. वह पास आ गये, हां, जब बड़े कार्यक्रम आयोजन होते है, तो सुरक्षाकर्मी चौकस हो जाते है.
 
 आज (26.9.94)को येल्तसिन वाशिंगटन आ रहे हैं. व्हाइट हाउस के खुले लॉन जो बाहर से साफ दीखता है. कैथरीना बाहर से क्लिंटन का बेडरूम दिखाती है, जिसके ठीक ऊपर 20-25 दिनों पूर्व छोटा हवाई जहाज गिरा था. संयोग से उस दिन क्लिंटन कहीं और सोये थे, लोकतांत्रिक व्यवस्था में जन प्रतिनिधि कैसे रहें, यह भारत को अमेरिका से  जानना चाहिए. भारत के एक प्रभावी सांसद या प्रभावी दबंग विधायक के आसपास सुरक्षा का जो घेरा है, अहातवाले बड़े बंगले है, वहां चौबीस घंटे खड़े ब्लैक कैट कमांडों पहरेदार हैं, टेलीविजन कैमरे से हो रही निगरानी है, उसके आगे अमेरिकी राष्ट्रपति का तामझाम कुछ भी नहीं है.
 
भारत के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति या महत्वपूर्ण केंद्रीय मंत्रियों के घरों की बात छोड़ दें, वहां से गुजरनेवाली सड़कें बंद है. घर प्राचीर या दुर्ग बना दिये गये हैं. राष्ट्रपति भवन के कई एकड़ में पसरे लॉन में अगर सुरक्षाकर्मी दो दिन पहले से तैनात कर दिये जाते हैं.
 एक लोकतंत्र की यह परंपरा है, जिसमें रहनुमाओं की सुरक्षा पर अरबों खर्च किये जा रहे हैं. दूसरी ओर दुनिया के सबसे समृद्ध ताकतवर देश के राष्ट्रपति आवास-संसद वगैरह में आप निर्द्धद्ध घूम सकते हैं.

घूम ही नहीं सकते, बल्कि विरोध भी प्रकट कर सकते है व्हाइट हाउस के ठीक सामने सड़क पार एक औरत बैठती है, अब उसके चेहरे पर उम्र झलक रही है पर बीस वर्षों पूर्व जब वह यहां बैठने आयी, तब अधेड़ रही होगी, भारतीय लहजे में कहें तो वह बीस वर्षों से धरने पर है, आणविक अस्त्रों के खिलाफ आलोचनात्मक पोस्टर और कटु नारों के साथ वह बैठी है. भारत में किसी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति के निवासों के आगे धरने की बात भूल जाये, मीलों पहले आपकों सड़क रोक दिया जायेगा. पटना में हड़ताल चौक देखिए विधानसभा -विधायकों के आवास से कितना दूर मुख्यमंत्री-राज्यपाल के पास तो वे कभी फटक ही नहीं सकते.

श्रीमती कैमरीन वाशिंगटन की एक-एक संस्थाओं के बारे में बताती है गर्व के साथ आंखों में चमक के साथ अमेरिकी लोगों का यह राष्ट्रीय बोध अद्‌भुत है. फ्रांस की शान, अंगरेजों का अभिजात्य, रोम के स्थापत्यकारों -कलाकारों का जादू और पश्चिम की विलक्षण प्रतिभाओं कलाकारों की उपस्थित वाशिंगटन के हर पुराने भव्य भवनों पर दर्ज है. संसद में विशिष्ट राजनेताओं की मूर्तियां है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपतियों के बीच मार्टिन लूथर की भी मूर्ति है.

अमेरिकी संसद भव्य कला स्थापत्य की प्रतिरूप है. एक तरफ सीनेटर बैठते हैं, दूसरी ओर हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव के सदस्य बीच में गोला बुर्ज है. 180 फीट लंबा 60-60 फीट चौड़ा,इसके ठीक ऊपर  फ्रीडम ऑफ स्टेच्यू है. वाशिंगटन वासियों का निर्णय है कि कोई भी भवन इस फ्रीडम ऑफ स्टेच्यू से बड़ा नहीं होगा. इस कारण इससे ऊंची इमारतें यहां नहीं बनतीं. राष्ट्रीय भावना का प्रतीक है, यह संकल्प इस कारण अमेरिकी उस संकल्प सपने में जीना चाहते है, शायद उनकी राष्टीय भावना का यही ऊर्जा-श्रोत भी है.

अमेरिकी संसद में भी अति सामान्य सुरक्षा है जब बैठकें होती है तो कोई भी विदेशी महज अपना पासपोर्ट दिखा कर संसद के आगंतुकों कक्ष में बैठ सकता है. बगल में संसद की विशाल लाइब्रेरी है. पर इसमें सिर्फ 100 सीनेटर या 435 जन प्रतिनिधि ही नहीं जा सकते, बल्कि 18 वर्ष से ऊपर का हर व्यक्ति जा सकता है, भारत की संसद की समृद्ध लाइब्रेरी में जाना कठिन है. सांसदों का पढ़ने-लिखने से रिश्ता टूटता जा रहा है. बिहार विधानसभा की लाइब्रेरी से शायद ही दो चार विधायकों का रिश्ता हो, पर विधानसभा की इस लाइब्रेरी को देखने के लिए विधायकों की जो समिति बनती है, वह दूसरी विधानसभाओं की लाइब्रेरी भ्रमण पर ही अनापशनाप व्यय करती है.