जन विरोधी अफसरों के चंगुल में शहर

जन विरोधी अफसरों के चंगुल में शहर

-दर्शक-

भ्रष्ट, बड़बोले, काहिल और जी हुजूरी करनेवाले अफसरों के हाथ यह शहर गिरवी बन गया है. एक सुनियोजित और विकृत मानसिकता के तहत इस शहर को अपनी जागीर में तब्दील करनेवाले दो तरह के अफसर यहां कार्यरत हैं. प्रथम, महाभ्रष्ट, जो दिन रात धन अर्जन की भूख से बेचैन है.

दूसरे, जो ईमानदार हैं, पर या तो दंभी हैं, या काहिल या निरीह बन कर समय काटना चाहते हैं. वैसा अफसर, जिसमें बौद्धिक उर्वरता, आत्मसम्मान, मानवीय दृष्टि हो, शायद इस शहर में डीआइजी डीएन गौतम के अतिरिक्त दूसरा नहीं. पर वैसे अधिकारियों ने स्वत: बनवास ले लिया है. कोई आश्चर्य नहीं कि डीएन गौतम इस शहर में पदस्थापित है, यह बहुत लोग नहीं जानते हों. इस शहर के आला अफसर, जब एक जातिगत सम्मेलन में महिमामंडित होने के लिए एक सांसद आते हैं, तो सुबह हवाई अड्डे पर अगवानी से लेकर उनके जाने तक वह उनके पीछे-पीछे घूमते हैं.

इस देश के दूसरे राज्य में ऐसे अफसरों से सजग जनता या प्रतिबद्ध नौजवान सार्वजनिक रूप से पूछते कि बताइए, आपको नौकरी का पैसा उक्त सांसद देते हैं या जनता देती है. किस हैसियत से आप किसी सांसद की आगवानी में गये थे? क्या वह महानुभव मंत्री हैं या सरकारी पदाधिकारी है, जिनकी अगवानी के लिए प्रोटोकाल के तहत जाना आपका अनिवार्य था? क्या आज के बाद जितने सांसद (चाहे किसी भी दल के) रांची आयेंगे, आप उनकी अगवानी में जायेंगे?

व्यक्तिगत संबंध-संपर्क या घरेलू रिश्ता अलग मामले हैं, पर जिस सार्वजनिक पद पर आप तैनात हैं, उसकी गरिमा-मार्यादा रखने के लिए भाड़े पर लोग नहीं बुलाये जायेंगे? आप किस सांसद या मंत्री के आशीर्वाद से पद पा गये हैं, यह सबको पता है. इसे सार्वजनिक करने की ललक क्यों हैं? क्या बिहार के रीढ़हीन अफसरों के बारे में यह नहीं मालूम है कि वे सार्वजनिक मंत्रियों - सांसदों की जो हुजूरी कर, कृपा पात्र बन ही अच्छी कुरसियों पर बैठते हैं, प्रतिभा या योग्यता की बदौलत नहीं.

इन रीढ़हीन और आत्मसम्मान बेच चुके अफसरों के बारे में देश जान रहा है कि सांसदों-नेताओं से पीटे जाने के बाद इनके अधिकारी संघ में मामूली विरोध का साहस नहीं है. अगर आला अफसर ऐसे हैं, तो मातहत अधिकारियों की कारगुजारियों के बारे में आसानी से आप अनुमान लगा सकते है. रांची के लोग रोजाना उन्हें भुगत रहे हैं.
 
बहुत पहले प्रख्यात प्रशासनिक अधिकारी धर्मवीर नेहरा था कि पुलिस अपराधियों का गिरोह बन गयी है. रांची से बेहतर इस धारणा को कौन पुष्ट करेगा? पुलिस के शीर्ष अफसर क्या कर रहे हैं, यह शहर जान रहा है. काश! ये पुलिस अधिकारी बिहार की चौहद्दी से बाहर निकल कर देख आते कि इन्होंने बिहार के लिए क्या नाम अर्जित किया है. बिहार के बाहर किसी पुलिस अफसर (चाहे जितनी बड़ी कुरसी पर हो) में साहस नहीं है कि वह निर्दोष लोगों को पीडि़त करें और भ्रष्टों को संरक्षण दे.

इस शहर में पुलिस अधिकारी पीकर एक ड्राइवर को गोली मारते हैं, पर कुछ नहीं होता. एक कोतवाल जीपी कर निर्दोष लोगों-बीमार व्यक्ति को परेशान करते हैं, पर कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं. एक अफसर अखबार के दफ्तर में घूस कर उत्पात करते हैं और बड़े अफसर उन्हें बचाने के लिए झूठ बोलते हैं. एक अफसर (जिनसे इस शहर को उम्मीदें थीं) अपने खिलाफ बयान देनेवालों की पिटाई करते घूम रहे हैं. किसी भी व्यवस्था में चाहे कोई कितना बड़ा व्यक्ति हो, जनतांत्रिक अधिकरों से खेलने की इजाजत नहीं दी जा सकती. इस शहर के कुख्यात अपराधी अगर मारे जाते हैं या पुलिस गिरफ्तार कर 'एनकाउंटर' शो करती है, तो लोग राहत महसूस करते हैं.

ऐसा करनेवाले पुलिस अधिकारी का मनोबल भी बढ़ाते हैं, लेकिन यह कौन सी मर्यादा है कि आप राह चलते लोगों को पकड़ कर पीटें. ऐसी कारगुजारियों से ही ये अधिकारी स्वाभिमानी युवकों को आतंकवादी बनने पर मजबूर करते हैं. कोई भी स्वाभिमानी इंसान (अगर गलत न किया हो) अपमान नहीं सह सकता. अगर रांची में इस गलत अपमान के खिलाफ सार्वजनिक सात्विक आक्रोश नहीं है, तो इस शहर के मुरदा होने में कोई शह है क्या? इस शहर के अफसरों का स्तर और मानसिक बुनावट यह है कि ये जयाप्रदा के साथ तसवीर खिंचवाने के लिए लालायित हो कर घूमते है.

देश के एक बदनाम सांसद रांची आते हैं, तो पुलिस के दो शीर्ष अफसर उन्हें लेकर आधी रात में रणनीति बनाते हैं. कहीं कोई मर्यादा, आत्मसम्मान, प्रतिबद्धता नहीं. ईमानदारी तो बड़ी चीज है. पता नहीं किन क्षणों में बंगाल के मनीषियों ने सपना देखा था, 'सबार ऊपरे मानुषेर सत्य तुम्हार ऊपर नाई', आज उसी मनुष्य को कुंठित, बौना, भ्रष्ट और खंडित करने के लिए जन विरोधी और मानव विरोधी व्यवस्था सक्रिय है.

बहुत पहले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में एक मूल मंत्र दिया था. 'किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं,' क्या रांची के युवा संगठनों-दलों, युवा टोलियों विश्वविद्यालय, कॉलेजों में ऐसे मुट्ठी भर भी लोग नहीं, जो निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर इस धारा को बदलने की चुनौती स्वीकारें. डर और भय से मुक्त होकर आवाज उठायें.