विचारधारा की मौत!

विचारधारा की मौत!

- हरिवंश - 

पत्रकारिता से जुड़े प्राय: हर सेमिनार, गोष्ठी या बातचीत के अंत में, यह सवाल उठ जाता है कि पत्रकारिता इतनी अप्रभावी-असहाय क्यों हो गयी है? राजसत्ता अपना बुनियादी काम-फर्ज छोड़ दें, भ्रष्टाचार हर स्तर पर दिखाई दे, गवर्नेस खत्म हो जाये, विधायिका अपनी बुनियादी भूमिका छोड़ दे, न्यायपालिका में दो-दो करोड़ मुकदमे लंबित हों और विलंब से न्याय ही नियति हो, कार्यपालिका, व्यवस्था पर बोझ बन गयी हो, तब पत्रकारिता पेज तीन के विषय क्यों मुख्य मानती है? अगर पत्रकारिता थोड़ी-बहुत कहीं प्रभावी दिखती है, तो उसका हस्तक्षेप क्यों असरदार नहीं होता?

हमारे समय की पत्रकारिता-पत्रकारों के लिए यह सबसे बड़ा सवाल है. इसका उत्तर सहज  नहीं है. अतीत के पन्नों और इतिहास में इस सवाल के उत्तर मिलते हैं.

 

वर्ष 1974: खबर : एक

 

हम छात्र थे. किशोर से युवा होने के दिन. स्कूल से कालेज या विश्वविद्यालय जाने के दिन थे. तब तक 1967-68 में शुरू हुए नक्सली आंदोलन की आग पूरी तरह  बुझी नहीं थी. उन्हीं दिनों गुजरात के मोरवी इंजीनियरिंग कालेज के विद्यार्थियों ने महंगाई, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद की. यह आवाज, बिहार आंदोलन में बदल गया और जेपी के नायकत्व का दूसरा दौर आरंभ हुआ. उन्हीं दिनों 1974 के आसपास की यह खबर है.

 

बिहार के खगड़िया से एक कांग्रेसी सांसद होते थे, तुलमोहन राम. उनके खिलाफ लोकसभा में एक मामला उठा. आरोप था कि किसी निजी कंपनी के प्रभाव में आकर उन्होंने तत्कालीन रेलमंत्री ललितनारायण मिश्र की मदद से रेल बोर्ड को प्रभावित किया. रेल बोर्ड को प्रभावित कर तुलमोहन राम ने उक्त कंपनी को प्राथमिकता के आधार पर माल वैगन आवंटित कराया. इस आरोप के अनुसार इस मदद के एवज में कंपनी ने तुलमोहन राम को एक या डेढ़ लाख रुपये बतौर घूस या कमीशन दिये. यह मामला लोकसभा में गूंजा और संसद से सड़क पर पहुंच गया.

 

30-31 वर्षों पुरानी यह खबर स्मृति में क्यों ताजा है? हमारा गांव दो नदियों के बीच है. गंगा और घाघरा. तब देश-दुनिया से पूरी तरह कटा था. साल के चार-पांच महीने टापू के रूप में रहता था, यह गांव. बाढ़ से घिरा. दूर-दूर तक कोई शहर, अस्पताल नहीं. आने-जाने का साधन नहीं. तब फोन-अखबार टीवी चैनलों का दौर नहीं था. सूचना क्रांति ने भौगोलिक दूरी को खत्म नहीं किया था मीलों रेत पर चल कर तब मेरे गांव में पहुंचा जा सकता था. पिछड़ापन-निरक्षरता उस गांव को भी विरासत में मिले थे. तब तुलमोहन राम द्वारा घूस लेने की बात उस सुदूर गांव में भी पहुंच गयी. 

 

जो तब सड़क, रेल और संचार से कटा टापू था. वहां चौपालों में, गांव की बैठकों में, अलावों के पास अपढ़, गंवई बड़े-बुजुर्ग-युवा चर्चा करते कि हमारे सांसद भी घूस-कमीशन लेने लगे हैं. तब तक राजनीति के गलियारे में 'दलाली' शब्द सुना नहीं गया  था. 'दलाल सांसदों' की दूर-दूर तक आहट नहीं थी. राजनीति में 'लाबिस्टों'  का उदय नहीं हुआ था. उन दिनों जब संचार क्रांति नहीं हुई थी, तब एक सांसद पर लगा आरोप अपढ़ गांव की गलियों तक बिजली की गति से पहुंच गया. देखने में भद्दे, बेतरतीब लेआउट के बावजूद तब के अखबारों-पत्रिकाओं में यह मुद्दा सुर्खियों में छा गया.

 

आज 2004 में लौट कर 1974 के उस दौर को देखता हूं, तो कई सवाल खड़े होते हैं.

 

वर्ष 2005 : खबर : दो

वर्ष 2004 के अंत में एचडी शौरी ने इंडियन एक्सप्रेस  में (10-11-12 नवंबर 2004) भारत की स्थिति पर अत्यंत विचारोत्तेजक-प्रभावी लेख लिखा. तीन किश्तों में. अपने एक लेख में उन्होंने उद्धृत किया, भ्रष्टाचार सूचकांक का अध्ययन करनेवाली जर्मनी की संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का. इस संस्था ने दुनिया के सर्वाधिक भ्रष्ट देशों में भारत को भी माना है. इसने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि पिछले एक साल में भारत के निजी घरानों-कारपोरेट हाउसों ने भारत सरकार के अफसरों को 'फेवर पाने', 'अपने पक्ष में नीति बदलवाने', 'कांट्रेक्ट' लेने के बदले 32000 करोड़ बतौर घूस दिये हैं.

 

1974 के मुकाबले इस देश ने काफी तरक्की की है. शिक्षित और संपन्न लोगों की संख्या में बेशुमार इजाफा हुआ है. यह सूचना-संचार क्रांति का दौर है, अब 24 घंटे के टीवी चैनलों की बाढ़ है. बेहतर-रंगीन अखबारों की पाठक संख्या करोड़ों में पहुंच गयी है. पर सरकारी अफसरों द्वारा 32000 करोड़ बतौर घूस लेने की यह खबर, या ऐसे दूसरे तथ्य अब 'मीडिया' में नहीं उठते-गूंजते. न ही लोकसभा - राज्यसभा में यह मामला उठा.

 

1974 और 2005 की इन दो महत्वपूर्ण खबरों-दृश्यों को साथ रख कर तौलने से अनेक रहस्य खुलते हैं.

 

1974 तक एक सांसद द्वारा महज डेढ़ लाख बतौर घूस या कमीशन लेने का आरोप देशव्यापी सवाल बन जाता था. 2004-05 आते-आते, भारत की नौकरशाही पर फेवर के एवज में 32,000 करोड़ घूस लेने का आरोप लगता है, पर संसद में एक सवाल नहीं उठता? यह फर्क महज 30-32 वर्षों में ? 

 

इसकी मूल वजह है कि पूरी राजनीति से विचारधारा या वाद गायब हो गये हैं. जब विचार, आदर्श और सपने राजनीति से गायब हो जायेंगे, तो राजनीति बांझ हो जायेगी. भारत की राजनीति इसी विचारहीनता और बांझपन के दौर में है. इसलिए इस मौजूदा राजनीति में  बड़े बदलाव-परिवर्तन की आहट नहीं है. 

 

विचारों-सिद्धांतों की राजनीति से ही समाज बदलता है, यह स्थापित तथ्य है. पत्रकारिता या किसी अन्य पेशे में वह ताकत नहीं है कि नया समाज गढ़ सके. पत्रकारिता अपनी सर्वश्रेष्ठ भूमिका में ‘वाचडाग’ का ही काम कर सकती है. लेकिन समाज बदलने की ताकत सिर्फ विचारों-सिद्धांतों की राजनीति में ही होती है. 

 

विचारधारा या वाद विरोधी लोग सवाल उठा सकते हैं कि विचारधाराओं की अति से ही फासिज्म, उन्माद, धर्मांधता, तानाशाही जन्मते हैं. आरंभ में ही यह समझ लेना होगा कि ये सब विचारधाराएं या वाद नहीं हैं, मानव का अस्तित्व मिटा देनेवाली धाराएं हैं. इस विश्लेषण में विचारधारा या वाद के तहत ऐसी उन्मादी प्रवृतियों को माना ही नहीं गया है.

 

राजनीतिक विचारधारा एक रणनीति, कौशल और कला है सर्वाधिक पीड़ित, गरीब, जरूरतमंद से लेकर आम नागरिकों का जीवन सुधारने-बेहतर करने का माध्यम. मानव समाज को लगातार बेहतर-से-बेहतर स्थिति में पहुंचाने का अनुशासन और सीढ़ी है, राजनीतिक विचारधारा. विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता से सपने जगते हैं. आदर्श-प्रतिबद्धता का माहौल बनता है. 

 

आंदोलन-संघर्ष पनपते हैं. विचारधारा से पनपे सामूहिक सपने को साकार करने के लिए लाखों की भीड़ जमा होती है. यह राजनीतिक जमात-भीड़ या समूह विचारधारा के कारण ही दल में तब्दील होते हैं. इस तरह विचारधारा आधारित दलों का जन्म होता है.

 

तीन दशक पहले तक समाजवादी, साम्यवादी, जनसंघ, कांग्रेस, नक्सली वगैरह सबके अपने-अपने सपने आर्थिक-सामाजिक कार्यक्रम थे. नक्सली इस संदर्भ में दल नहीं थे. वह विचारधारा थी. पर मध्यममार्ग दलों के पहले वार्षिक अधिवेशन होते थे. कार्यक्रमों पर बहस होती थी. नीतियां तय होती थीं. पार्टी की विचारधारा के अनुरूप कार्यक्रम बनते थे.

 

पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र था. पार्टियों के अंदर चुनाव होते थे. पार्टी आलाकमान की निजी पसंद के खिलाफ उसी पार्टी में अपने विचार-प्रतिबद्धता के कारण नेता, पार्टी संगठन चुनावों में जीतते थे. उन कार्यक्रमों को साकार करने के लिए विधायिका से लेकर लोक के बीच बहस होती थी. संसद से सड़क तक दल अपने बुनियादी मुद्दे उठाते थे. उन मुद्दों के ईद-गिर्द समर्थन जुटाते थे. अपने राजनीतिक वसूलों-विचारों और प्रतिबद्धता के अनुरूप नेता-कार्यकर्ता जीते थे. पहचाने जाते थे. कार्यक्रमों - विचारधारा से दल - नेता की पहचान होती थी. गांधी की भाषा में कहें तो 'साधन' (जीवनशैली, पार्टी रणनीति, पार्टीलाइन) 'साध्य' (विचारधारा) के अनुरूप होता था. 

 

60-70 के दशकों तक इन मूल्यों का भारतीय राजनीति में असर था. उन्हीं दिनों चुनाव सुधार की चर्चा शुरू हई. जेपी के आह्वान पर भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए संथानम कमेटी बनी. डॉ राममनोहर लोहिया ने भाषा की गैरबराबरी का सवाल उठाया. विषमता के खिलाफ संघर्ष किया. जेल गये. महंगाई के खिलाफ दामबांधों आंदोलन चलाया. 

जाति उन्मूलन को मुद्दा बनाया. सप्त क्रांति (समाज-देश बदलने की रणनीति) की बात थी. 1960 के बाद लगातार उन्होंने निहत्थी जनता पर पुलिस की गोलीबारी, जातिगत गैर बराबरी, अंग्रेजी भाषा के प्रभुत्व, शासक वर्ग की विलासिता, दामों की लूट, पूंजीशाही-नेताशाहों-नौकरशाहों की सांठगांठ को मुद्दा बनाया. संसद से सड़क तक लोहिया की पार्टी ने नये सवाल उठाये.

 

परिणाम? 1966-67 तक अनेक राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकारें बनीं. चौथे आम चुनाव में इस विचारगत राजनीति का चमत्कार दिेखा.

 

उन्हीं दिनों स्वतंत्र पार्टी का उदय हुआ. निजी क्षेत्र को प्राथमिकता देने और कांग्रेस सरकार के 'लाइसेंस कोटा परमिट राज' संस्कृति के खिलाफ. एक वैकल्पिक आर्थिक नीति के साथ. इस दल को विचारों के आधार पर पूंजीपति वर्ग का समर्थक माना गया. पीलू मोदी, मीनू मसानी, प्रो एनजी रंगा वगैरह ने अपनी वैचारिक मान्यता के आधार पर पार्टी को आगे बढ़ाया. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का आशीर्वाद इस दल को प्राप्त था.

उसी तरह जनसंघ के प्रवर्त्तक डॉ दीनदयाल उपाध्याय 'मानव एकात्मवाद' से लेकर 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के मुद्दे पर देश में अपनी पार्टी को खड़ा करते रहे. बंगाल में माकपा के प्रमोद दासगुप्त गांव-गांव माकपा की विचारधारा के अनुरूप कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करते रहे. हर गांव में 'लाइब्रेरी खोलने' का अभियान चलाया. प्रमोद दासगुप्त के इस वैचारिक आंदोलन की बुनियाद पर ही बंगाल में मार्क्सवादी 1977 के बाद से कायम हैं.

 

समाजवादी राममनोहर लोहिया हों या जनसंघी दीनदयाल या मार्क्सवादी प्रमोद दासगुप्त. इनमें एक विचित्र समता थी. डॉ लोहिया मरे, तो पास में दो जोड़ी धोती भी नहीं थी. कोई निजी संपत्ति नहीं. उसी तरह दीनदयाल जी की हत्या हुई, तो पास में कुछ नहीं था. प्रमोद दासगुप्त ने सबकुछ अपनी पार्टी और उसकी विचारधारा के लिए लगा दिया. विचारधारा के स्तर पर इन तीन ध्रुवों के नेताओं पर गांधीवादी राजनीति जीवनशैली की छाप थी. 

 

गांधीवाद का वैचारिक असर निजी जीवन, रहन-सहन में था. अपने-अपने दल के कार्यकर्ताओं के निजी जीवन दर्शन पर डॉ लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय और प्रमोद दासगुप्त जैसे नेताओं का गहरा असर था. गांव-गांव तक ऐसे नेताओं की प्रेरणा से विचारधारा के ईद-गिर्द राजनीतिक कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी हुई. प्रतिबद्ध, ईमानदार और कर्मठ कार्यकर्ता साथ आये. ऐसे ही लोगों-विचारों की नींव पर ये दल खड़े हुए.

 

खुद कांग्रेस में वैचारिक मुद्दों के प्रति 1970-72 तक जागरूकता थी. वैचारिक आग्रह था. युवा तुर्क का उदय, बैंक राष्ट्रीयकरण, कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण, गरीबी हटाओ जैसे कार्यक्रम, वैचारिक राजनीति के ही प्रतिफल थे. तब तक कांग्रेस में अंदरूनी लोकतंत्र भी था. 

 

इंदिरा गांधी की इच्छा के खिलाफ शिमला कांग्रेस कार्य समिति के चुनाव में युवा तुर्क चंद्रशेखर सबसे अधिक मत पाकर चुने गये. यह वैचारिक द्वंद्व का परिणाम था. यह 1972 की घटना है. हालांकि इस बात को भी हम विस्मृत नहीं कर रहे हैं कि भाकपा-माकपा के कांग्रेस होते हैं. भाजपा का भी अधिवेशन होता है. माले जैसी पार्टियां भी आंतरिक लोकतंत्र की पहल लेती है.

 

मुख्यधारा की राजनीति में इन उदाहरणों को लिया जा सकता है. तेदेपा के अधिवेशन की चर्चा भी की जा सकती है. वृहत्तर अर्थों में कहा जा सकता है कि ज्योतिबसु को सीपीएम ने आंतरिक लोकतंत्र के कारण प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया. लेकिन ग्लोबल अर्थ व्यवस्था का विरोध-समर्थन सभी रस्मी बन कर क्यों रह गये है और वैचारिक मसले पार्टी कतारों में कम क्यों रहे हैं. यह अत्यंत पीड़ादायक सवाल है.

1972 आते-आते आजादी की लड़ाई के मूल्य, सरोकार और असर कम होने लगे. विचार या उसूल कैसे समाज बदलते हैं, यह देखना हो तो भारत की आजादी की लड़ाई का स्मरण करना होगा. गांधी के उदय ने गुलाम और अनपढ़ भारत की  फिजां बदल दी. 

 

गांधी एक व्यक्ति नहीं रह गये, वह एक जीवनशैली, विचारधारा और राजनीतिक संस्कृति (मूल्य आधारित) बन गये. उनकी राजनीति ने जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया. उनके आंदोलन से-उनके असर से एक से बढ़ कर एक समाजसेवी निकले. वकालत के क्षेत्र में, अध्यापन के क्षेत्र में, पत्रकारिता के क्षेत्र में गांधीवादी मूल्यों ने एक नयी ताकत, आभा और ऊर्जा दी. 

 

निष्ठावान, प्रतिबद्ध और वैचारिक लोगों को आगे बढ़ाया. ऐसे लोगों ने त्याग, ईमानदार कर्म और गांधीवादी जीवनमूल्यों से आस्था और विश्वास  का एक नया माहौल बनाया. लगा कि जहां हिंसक क्रांति समाज बदलाव-व्यवस्था में विफल हो गयी है, वहां गांधीवादी सत्याग्रह और अहिंसा कामयाब होंगे. यह गांधीवादी विचारों का ही चमत्कार था.

 

 पत्रकारिता का स्वर्ण युग माना जाता है, आजादी की लड़ाई का दौर. पत्रकारों-अखबारों के उस दौर के योगदान-बलिदान को आज भी उद्धृत किया जाता है. इलाहाबाद से एक अखबार निकलता था 'स्वराज्य'. 'स्वराज्य'  के जितने भी संपादक हुए, उन्हें कालापानी की सजा (अंडमान जेल) हुई, इसलिए 'स्वराज्य' के संपादक का पद खाली होता, तो विज्ञापन में योग्यता की मांग होती, जो अंडमान जेल जाने के लिए तैयार हो, वही आवेदन करें. तब भी योग्य से योग्य आवेदकों की लाइन लगी रहती. अपने विचारों-आग्रह के लिए जेल जाने को तैयार. कष्ट उठाने के लिए तैयार. वह सत्ता की कुर्सी या विधायक /सांसद/ मंत्री बनने वालों की भीड़ नहीं थी. यह गांधी युग का चमत्कार था. 

 

उनके विचारों का जादू था. पत्रकारिता का नहीं. गांधी युग ने जिन मूल्यों, वसूलों की बात की, सत्याग्रह, अहिंसा का प्रतिपादन किया, समाज के कमजोर से कमजोर व्यक्ति को 'अंतिम व्यक्ति' माना, इन विचारों के पारस पत्थर से जुड़ कर-स्पर्श पाकर, पत्रकारिता निखरी, वकालत पेशा निखरा, अध्यापक सम्मानित हुए. अपने तप-त्याग से समाजसेवियों ने अपनी जगह बनायी. 

 

इन बदलावों के मूल में थी, गांधीवादी विचारधारा. इस विचारधारा ने एक मरते हुए पिछड़े भारतीय समाज को उत्कर्ष पर पहुंचा दिया. हजारों वर्ष की गुलामी से पीड़ित भारतीय समाज को पैरों पर खड़ा कर दिया. दुनिया को लगा, भारत से नये मूल्य निकल रहे हैं, जो मानवता को मुक्ति द्वार तक पहुंचायेंगे. तब प्रो अर्नाल्ड टायनबी ने लिखा कि संकटग्रस्त पश्चिमी सभ्यता को पूरब से (आशय भारत से) नयी रोशनी मिलेगी. यह मूल्यबोध की राजनीति का असर था. गुलाम भारत की रोशनी के लिए विकसित पश्चिमी देश प्रतीक्षारत थे.

 

गांधी की राजनीति का आकर्षण क्या था? चितरंजन दास (सीआर दास) जैसे बड़े बैरिस्टर जो उन दिनों लाखों की प्रैक्टिस करते थे, आमद-वकालत छोड़ कर आंदोलन में कूद गये. नया समाज बनाने के लिए. भौतिक सुविधाएं छोड़ कर जेल की राह चुनी. अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे थे. वह अकेले नहीं थे. सीआर दास जैसे अनेक लोगों ने अपना 'निजी कैरियर' आकांक्षाएं-महात्वाकांक्षाएं, देश के लिए होम कर दिया. 

 

समृद्धि भौतिक सुख का जीवन छोड़ कर गरीबी, कष्ट और जेल की राह चुनी. लाखों युवा निकल पड़े. यह था विचारों का आकर्षण. गांधीवादी विचारों का चमत्कार! इतिहासकार कहते हैं कि गांधी उदय के पूर्व भारतीय 'इलीट वर्ग' की बात करनेवाली कांग्रेस, अंग्रेजों के सामने पेटीशन (याचिका) देनेवाली संस्था थी. प्रेयर (गिड़गिड़ाने-प्रार्थना करनेवाली संस्था) करनेवाली पार्टी थी. पर गांधी के साथ ही वही कांग्रेस 'मास मूवमेंट' (जन आंदोलन) में तब्दील हो गयी. यह था, गांधीवादी विचारों-मूल्यों का प्रभाव. मार्क्सवादी मानते हैं कि इतिहास दोहराता है. 

हालांकि विसंगति के रूप में. गांधी के 'दांडी मार्च' की आज पुनरावृत्ति हो रही है. क्या यह दोहराव उस जादू का एहसास करा पाया. जब गांधी ने दांडी मार्च शुरू किया, तो ब्रिटिश सत्ता ने मखौल बनाया. पर जब दांडी मार्च खत्म हुआ, पूरी दुनिया स्तब्ध और चमत्कृत थी. यह पश्चिम के मैकियावेली राजनीतिक दर्शन का गांधीवादी उत्तर था.

 

आजादी के बहुत बाद तक गांधीवादी विचारों का असर रहा. विचारहीन दौर (1980 के आसपास शुरू) के नेताओं की जमात जब प्रभावी होने लगी, तब बचे-खुचे पुराने नेता अपने-अपने दलों में अलग-थलग पड़ गये या राजनीति से ही हट गये. यह वह समय था, जब इंदिरा गांधी ने कहा कि भ्रष्टाचार अंतरराष्ट्रीय प्रवृति है. कांग्रेस के अंदर आलाकमान की निरंकुशता इंदिराजी के समय ही बढ़ी. कांग्रेस का अंदरूनी लोकतंत्र खत्म हुआ. विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका व अन्य संस्थाओं को इंदिरा युग ने भारी नुकसान पहुंचाया. 

चापलूस, दलाल और मौकापरस्तों की भीड़ को उन्होंने हर जगह शिखर तक पहुंचाया, जिनके लिए आदर्श, सिद्धांत और मूल्य महज सत्ता पाना था. ऐसे लोगों की भीड़ ने सत्ता पाकर गांधी युग  के मूल्यों को राजनीति से खत्म कर दिया. सत्ता, सुविधा व पैसे के लिए विचारहीन राजनीति और रातोंरात दल बदलना फैशन हो गया.

 

विचारों की राजनीति (1980 तक) और विचारहीनता के दौर की राजनीति (1980 के बाद) के दलों-नेताओं के  आचरण, जीवनशैली और प्रतिबद्धता के बीच फर्क आसान है.

- 1995 में प्रधानमंत्री पर आरोप लगा कि लोकसभा में चार सांसदों को रिश्वत दे कर उन्होंने अपनी सरकार बचायी. अदालत में अपने तकनीकी बचाव में उस प्रधानमंत्री ने देश के जाने-माने बड़े वकीलों को उतारा.

- आजादी की लड़ाई के दौरान चर्चिल ने महात्मा गांधी को 'नंगा फकीर' कहा था. 1922 में गांधी जी देशद्रोह के आरोप में पकड़े गये. जमानत पर उन्हें रिहा करने की पेशकश हुई. बैरिस्टर गांधी ने इनकार कर दिया. मुकदमे की सुनवाई में बचाव के लिए कोई वकील नहीं रखा. कहा, मैं कानूनी पेंचीदगियों में अपना बचाव नहीं करना चाहता, मेरे खिलाफ देश द्रोह के जो भी आरोप सरकारी वकील ने लगाये हैं, सही हैं. मैं अपने सिद्धांत पर कायम हूं.

 

अपने उसूलों-सिद्धांतों के प्रति यह प्रतिबद्धता आजादी की लड़ाई में गांधी ने विकसित की. इसी परिवेश का असर था कि रेलमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने रेलदुर्घटना का नैतिक दायित्व लेते हुए इस्तीफा दे दिया था. प्रधानमंत्री पद महज एक संवैधानिक गद्दी नहीं है, उसकी एक नैतिक आभा-ऊंचाई हैं. 

पूरा देश जानता है कि सांसदों को रिश्वत दे कर नरसिंहराव की सरकार बची, पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नहीं मानते थे. सांसदों को रिश्वत देकर उनकी गद्दी बच गयी, पर प्रधानमंत्री पद की आभा-चमक-नैतिक ताकत खो गयी. यह विचारविहीन सिद्धांत विहीन राजनीति का असर था. 1980 में मोरारजी की जनता पार्टी की सरकार गिरी, तो दोबारा उन्होंने जोड़-तोड़ से सरकार बनाने  से मना कर दिया. यह फर्क उल्लेखनीय है. एशियन एज में (25 मार्च 2005) भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी विश्वबंधु गुप्ता ने देश के वित्त मंत्री को सार्वजनिक जानकारी देते हए एक अत्यंत महत्वपूर्ण लेख लिखा है, 'सम क्वेश्चंस फॉर मिस्टर चिदंबरम'. इस लेख में अनेक विस्फोटक सूचनाएं हैं. 

 

मसलन एक ताकतवर निजी घराने के पास 2000 फर्जी कंपनियां हैं. श्री गुप्ता के अनुसार यह जानकारी आयकर विभाग और भारत सरकार को है, पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही. तेलगी प्रकरण (जिसमें अनेक बड़े नेता-अफसर शामिल हैं) में 35,000 करोड़ रुपये के घोटाले की पुष्टि हो चुकी है. पर जांच आगे नहीं बढ़ रही. रिलायंस शेयर प्रकरण में एक सांसद और एक पूर्व मंत्री (एक कांग्रेस-एक भाजपा) ने कैसे सैकड़ों करोड़ के शेयर लिये, यह तथ्य सार्वजनिक हो गया है. श्री गुप्ता के अनुसार भारत में मोटे तौर पर सालाना 10 लाख करोड़ का काला धन सरकुलेट हो रहा है. 

 

भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत एक अफसर ने इन विस्फोटक सूचनाओं पर अखबार में लेख लिखा है, सार्वजनिक रूप से उठाया है. सरकार उस पर कार्रवाई कर सकती है, पर इन मामलों पर जांच नहीं करा सकती. केंद्र सरकार की जानकारी में पेट्रोल मिलावट में सालाना 40,000 करोड़ रुपये का घोटाला हो रहा है. भारत सरकार के एक उच्चाधिकारी एलएन शास्त्री ने जब यह प्रकरण उठाया, तो वह बदल दिये गये. विचारहीन राजनीति के ये मामूली उदाहरण हैं. सार्वजनिक लूट-भ्रष्टाचार के ऐसे असंख्य प्रकरण गली-गली में हैं.

 

पर अब शायद ही लोगों को याद हो. रफी अहमद किदवई नामक एक नेता थे. कानून की डिग्री थी उनके पास, पर कभी वकालत नहीं की. उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहनेवाले. वहां मिट्टी का पुश्तैनी घर था. खपरैल. आजीवन केंद्रीय मंत्री रहे. पर मरने के बाद उनकी पत्नी और बच्चे गांव, बाराबंकी लौट आये.

 

उसी टूटे-फूटे खपड़ैल घर में, आजीवन केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता रहने के बावजूद उनके पास कोई संपत्ति नहीं थी, दिल्ली में घर नहीं था. स्वतंत्रता सेनानी किदवई साहब अकेले, गांधीवादी राजनीति के  पुष्प नहीं थे. राजनीति में सिद्धांतों-विचारों पर चलनेवाले ऐसे लोगों की तब लंबी कतार थी.

 

आचार्य पुरुषोत्तम दास टंडन, आचार्य नरेंद्र देव, लालबहादुर शास्त्री जैसे लोगों या पीढ़ी की बात छोड़ दें, गांधी की आभा में आगे बढ़े कांग्रेस के मामूली कार्यकर्ताओं का चरित्र, गांव-जिला स्तर पर जनता को प्रेरित करता था.

 

यह पवित्रता, नैतिक आभा, प्रतिबद्धता और मूल्य सिर्फ राजनीति में ही नहीं थे. इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज थे, एसके धर. वह तीन वर्ष से कुछ कम समय जज रहे. इसलिए उन्हें पेंशन नहीं मिला. वह रिटायर्ड जज थे, इसलिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस नहीं कर पाये. वह दिल्ली चले गये. उनकी आंखों में समस्या हुई. वह अपने गृह शहर आगरा लौट गये. आर्थिक रूप से अत्यंत कठिनाई के दिन थे उनके. 

 

उन्हीं दिनों कलकत्ता के मुख्य न्यायाधीश ने उनसे एक काम में 'आर्बिट्रेटर' बनाने का आग्रह किया. सप्ताह में सिर्फ पांच दिन काम करना था. धर साहब ने मना कर दिया. कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को लगा कि फी कम होने से धर साहब ने मना किया है. उन्होंने पुन: प्रस्ताव भेजा. फी 50,000 से बढ़ा कर एक लाख का प्रस्ताव दिया. 

 

धर साहब ने कलकत्ता के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा. आभार जताया. कहा कि मैंने यह प्रस्ताव 'फी' के लिए अस्वीकार नहीं किया है. मुझे पैसे की सख्त जरूरत है. पर, यह अस्वीकार इसलिए किया है कि जिस न्यायधीश के पद पर तीन वर्ष से कम रहा, उसकी गरिमा-मर्यादा पर मेरे किसी काम से आंच न आये. न्यायपालिका में ऐसे अनेक धर थे. नौकरशाही और राजनीति में भी.

 

यह नैतिक बोध, ऊंचे जीवन मूल्य कहां से मिले, गुजरी पीढ़ी को ? दूसरा उदाहरण है, कैलाशनाथ काटजू का. श्री काटजू स्वतंत्रता सेनानी थे. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मशहूर वकील. आजादी के बाद वह उड़ीसा-बंगाल के राज्यपाल बने. उनके पुत्र शिवनाथ काटजू इलाहाबाद उच्च न्यायालय में (उम्र लगभग 40 वर्ष) औसत प्रतिभा के वकील थे. 

 

ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन (जिसका उत्तर प्रदेश में कारोबार था) के चेयरमैन सर रोबर्ट मेनजीन ने शिवनाथ काटजू को अपनी कंपनी के बोर्ड आफ डाइरेक्टर में रखने का प्रस्ताव दिया. शिवनाथ काटजू ने अपने राज्यपाल पिता को कलकत्ता में पत्र लिख कर यह सूचना दी. कैलाशनाथ जी ने अपने बेटे को पत्र लिखा. प्रिय शिवाजी ! तुम्हारा पत्र पा कर एक पिता के रूप में गौरव का बोध हुआ. बीआइसी कंपनी में हमारे शेयर बहुत कम हैं.

 

इसलिए कम शेयर के आधार पर तुम्हें 'बोर्ड आफ डाइरेक्टर' में रखा जाना युक्तिसंगत नहीं लगता. संभव है तुम्हारी योग्यता के आधार पर यह पद अॅाफर हुआ हो. यह मेरे लिए और भी गौरव की बात है. लेकिन तुम्हारी एक समस्या है, और वह है, तुम्हारे पिता. हालांकि बंगाल  में बीआइसी कंपनी का कुछ नहीं है. गवर्नर सिर्फ 'कास्मेटिक पद' है. मैं तुम्हारे सम्मान-योग्यता के अनुरूप किसी अन्य राज्य में तुम्हें ऐसा पद पाते देखना चाहूंगा. अपने गृह राज्य (कैलाशनाथ काटजू उत्तर प्रदेश के रहनेवाले थे) में नहीं. मैं जीवन में अपनी पारी खेल चुका हूं. 

 

तुम्हारे रास्ते में नहीं आना चाहता. अगर तुम बीआइसी बोर्ड अॅाफ डाइरेक्टर में जाने की सहमति दोगे, तो मुझे सूचना दे देना. मैं राज्यपाल का पद छोड़ कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने लौट आऊंगा.

 

पुत्र शिवनाथ काटजू ने बीआइसी कंपनी का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया और कैलाशनाथ काटजू बंगाल के गवर्नर बने रहे.

 

राजनीति में यह नैतिक ऊंचाई किन सामाजिक-राजनीतिक मूल्यों से तब देश को मिली ?

 

भारत के प्रधानमंत्री थे, पंडित जवाहरलाल नेहरू. उनके घर को इंदिरा गांधी संभालती थी. राजीव, ब्रिटेन पढ़ने गये थे. राजीव गांधी ने अपना खर्च चलाने के लिए नाना को कुछ और पैसे भेजने का आग्रह किया, पत्र लिखकर. पंडित नेहरू  ने राजीव गांधी को पत्र लिखा. 

 

तुम्हारे आर्थिक संकट की चर्चा पढ़ कर मुझे कष्ट हुआ. यकीन है कि तुम मेरी बात पर विश्वास करोगे कि तुम्हें जो कुछ भी भेज पा रहा हूं, उतना ही मैं अपनी तनख्वाह और पुस्तक रायल्टी (आजकल लोग मेरी पुस्तकें कम पढ़ रहे हैं) की मामूली आय से निकाल पाता हूं. क्यों नहीं तुम खाली समय में कुछ काम करते हो ! अधिकांश विद्यार्थी खास तौर से दूसरे देशों से गये विद्यार्थी ऐसा ही करते हैं. इस तरह तुम भी शांति से रहोगे और मुझे भी चैन रहेगा.

 

यह पत्र एक प्रधानमंत्री ने अपने वारिस को लिखा था. यह विचारों की राजनीति के दिनों की बात है.

 

विचारहीन राजनीति के दिनों का एक उदाहरण. 1995 के शुरू में अखबारों की सुर्खियों में खबर थी. एक सांसद के पुत्र को इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिला. कैपिटेशन फी माफ कर दिया गया. उस लड़के को विश्वभ्रमण पर कालेज ने भेजा. विदेश यात्रा के हवाई खर्च और आवभगत की जिम्मेवारी देश के दो बड़े  औद्योगिक घरानों ने उठायी.

 

एक दौर था, जब देश का प्रधानमंत्री अपने वारिस की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पाता था. दूसरा दौर आया कि एक मामूली सांसद के विद्यार्थी बेटे पर करोड़ों खर्च करनेवाले तैयार थे.

 

पहले दौर के सामाजिक मूल्य (जो राजनीति ने तय किये) में शार्टकर्ट से समृद्धि, वसूलों के खिलाफ माने जाते थे. शेयर बाजार या स˜ट्टे से धन कमाना, सामाजिक हैसियत-रुतबा नहीं बढ़ाता था. गरीब का श्रम, काली कमाई से ज्यादा सम्मानजनक माना जाता था. पंडित नेहरू, बेंजामिन फ्रेंकलिन की उक्ति दोहराते थे. एक युवक के जीवन में सबसे दुखद और अंधकारमय क्षण वह है, जब वह बिना श्रम किये पैसा पाना चाहता है. 

श्रम, ईमानदारी के ऊपर पूंजी, छल-कपट की विजय और बिना परिश्रम के काली कमाई की संस्कृति का विकास, विचारहीन राजनीति के उल्लेखनीय पहलू हैं.

 

गांधी युग के नेताओं के आचरण की घटनाएं उन दिनों की हैं, जब राजनीति के फोकस में गांधी का अंतिम आदमी था. लोकसभा में कांग्रेस सरकार के खिलाफ डॉ लोहिया ने पहला अविश्वास प्रस्ताव पेश किया. नेहरू जी प्रधानमंत्री थे. डॉ लोहिया ने गरीबी का मुद्दा उस अविश्वास प्रस्ताव में उठाया.

 

एक दौर यह है कि बड़े घरानों के पक्ष-विपक्ष में उनके अनुरूप नीतियां बदलवाने के लिए सांसद दस्तखत करते घूमते हैं. राज्यसभा में पूंजी के बल पहुंचने वाले सांसदों  की संख्या देखी जा सकती है. बेशर्म लॉबिस्ट दलाल और घोर अयोग्य लोग किन खूबियों के कारण विधायिका में पहुंच रहे हैं, यह पूरा देश-मीडिया देख रहा है.

 

तब संसद (विधायिका) में बहस-सवालों का चरित्र और स्तर भिन्न था इस बहस के केंद्र में गांधी का 'अंतिम आदमी' था. दरअसल सिद्धांत की राजनीति-विचारों की राजनीति-मूल्यों की राजनीति, कार्यक्रमों-नीतियों के आधार पर चलती है. इस राजनीति में  साधन और साध्य (एवि) नैतिक अंकुश के रूप में काम करते हैं. 

 

अब मूल्यविहीन राजनीति के केंद्र-फोकस में महज सत्ता पाना है. साध्य, सत्ता है. उसे पाने के लिए कोई साधन इस्तेमाल करने में हिचक नहीं है. चाहे कांग्रेस द्वारा सांसदों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में करने का सवाल हो या भाजपा द्वारा सुखराम जैसे लोगों की मदद से सरकार बना कर भय, भूख और भ्रष्टाचार मिटाने का नारा लगाना हो. यह कर्म करते हए किसी को शर्म, या पछतावा नहीं है, क्योंकि कोई मूल्य, आदर्श या विचार बचे ही नहीं हैं.

 

1990 के आसपास सोवियत रूस के विघटन के तत्काल बाद ही अंतरराष्ट्रीय चिंतक-विचारक फांसिस फुकियामा ने कहा कि अब इतिहास का अंत हो गया है. विचारधारा खत्म हो गयी है. हालांकि इतिहास बताता है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्ष सार्वजनिक जीवन को विचारों-सिद्धांतों से प्रभावित करने वाले सबसे प्रभावी वर्ष थे.

 

पहले कहा गया था कि दुनिया डार्विन के मत्स्य न्याय से चलती है. उसने प्रकृति का नियम बताया कि बड़ी मछली, छोटी मछलियों को खा कर ही जीवित रहती है. फिर हक्सले के विचार ने समाज को प्रभावित किया. हक्सले ने एक कदम बढ़कर कहा 'जियो और जीने दो' . तब राजसत्ता का प्रतीक राजा होता था. उसके हाथ में 'अनियंत्रित राजसत्ता' थी. हॉब्स ने इसका पूरा ब्योरा दिया है. लॉक ने एक कदम आगे जाकर 'नियंत्रित राज्यसत्ता की बात की. रूसो ने आगे बढ़ कर लोकसत्ता का सपना दिखाया. इसके बाद आया गरीबों का मसीहा मार्क्स. 

 

उसने गरीबों के लोकतंत्र की अवधारणा विकसित की. मार्क्स के पहले किसी पीर-पैगंबर या धर्म प्रवर्त्तक ने ऐसा नहीं माना था कि अमीरी-गरीबी को गरीबों के शासन द्वारा हटाया जा सकता है. उसने साफ-साफ कहा 'अमीरी और गरीबी भगवान की बनायी हुई नहीं है. किसी भी धर्म में उसका विधान नहीं है, यदि कोई धर्म इस भेद को मंजूर करता है, तो वह धर्म गरीब के लिए अफीम की गोली है.'

 

20वीं सदी के शुरुआती दौर में ही विचार और सिद्धांत के स्तर पर बदलाव की इस अवधारणा को आगे बढ़ाया गांधी ने. उन्होंने मनुष्य के मन बदलने की बात की. स्थायी परिवर्त्तन के लिए अहिंसा, सत्याग्रह की अवधारणा विकसित की.

 

19 वीं सदी के अंत और 20 वीं सदी के आरंभ में विचारों के स्तर पर चल रहे इन द्वंद्वों का समाज-दुनिया पर क्या असर पड़ा ? मानवसमाज पूंजीवाद से समाजवाद, साम्यवाद, कल्याणकारी लोकतंत्र के द्वार-द्वार मुक्ति के लिए भटकता रहा.

 

बीसवीं शताब्दी की जवानी ही विचारों पर आधारित सामाजिक-राजनीतिक क्रांति से शुरू होती है. 1917-20 के बीच रूस की क्रांति, लेनिन की बोल्शेविक क्रांति ने दुनिया को क्या दिया ? प्रखर पत्रकार राजेंद्रमाथुर को स्मरण करें, तो दस दिन, जिन्होंने दुनिया को हिला दिया.

 

आनेवाले साठ वर्षों तक दुनिया के देशों-विचारकों-राजनेताओं को वह वैचारिक अस्त्र दिया, जिससे लगा कि एक प्रयत्न और हुआ कि सारी धरती, सारा समाज स्वर्ग के द्वार तक पहुंच जायेगा. तब कौन जानता था कि स्वर्ग के पट कभी नहीं खुलते. मानव नियति यही है कि मुक्ति द्वार तक पहंच कर छले जायें. रुस का साम्यवाद, रूस के राज्यवाद में बदल गया.

 

फिर एक नया प्रयोग दुनिया ने देखा. गांधी का सत्याग्रह, लगभग मुर्दा देश-गुलाम समाज का एक नया मंत्र-प्रयोग था. इसने अन्यायी की आंख में आंख डाल कर देखने की ताकत दी. इस प्रयोग से यह एहसास जगा कि भारत जीवित है. 

 

हम गाने लगे कि यूनान, मिस्र और रोम नष्ट हो गये, फिर भी हम बचे हैं. पर गांधी का प्रयोग भी मुक्ति द्वार के पहले ही ठहर गया. राजेंद्र माथुर के शब्दों को दोहरायें तो लेनिन का स्वप्न (साम्यवाद) कोसिगिन तक आते-आते एक स्थावर संपत्ति बन गया. गांधी का स्वप्न भी आज एक स्थावर संपत्ति है, ....'

 

विचारविहीन राजनीति को समाजवाद, साम्यवाद, गांधीवाद, कल्याणकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विफलताओं से ऊर्जा मिली. ग्लोबलाइजेशन (खगोलीकरण), मार्केट इकोनॉमी (बाजार व्यवस्था), ग्लोबल विलेज (गांव बनती दुनिया) के इस नये दौर के मूल में है, अमेरिका का विराट उद्योगवाद, विज्ञापनवाद, अमेरिकी संस्कृति और उपभोक्तावाद. समाजशास्त्री इसे कोला कल्चर भी कहते हैं. इसमें खुलापन है. 

 

यह युवाओं को आकर्षित करती है. मुक्त सेक्स और बंधनरहित जीवन की बात करती है. यह सिर्फ फास्टफूड से ऊर्जा नहीं पाती, फास्ट लाइफ इसकी खूबी है. व्यक्तिवाद इसकी पहचान है. यह समूह की नहीं,  निजता की बात करती है. आज पूरी दुनिया का युवा (धर्म, क्षेत्र को भुला कर) इसके प्रभाव में है. फास्ट फूड, फास्ट संगीत, फास्ट जीवन, क्षण में जीना, मौज-मस्ती, पीना-पिलाना, पार्टियां और वर्जनाहीन जीवन, यह ग्लोबल संस्कृति उभर रही है. 

 

सौजन्य अमेरिका. उदारीकरण, ग्लोबल विलेज का नया दौर इसी सांस्कृतिक बुनियाद पर टिका है. लगभग सारे राजनीतिक दलों के विचार और दर्शन इन्हीं मुद्दों के ईद-गिर्द घूम रहे हैं. इन मुद्दों ने दलों के वैचारिक फर्क-सिद्धांत को मिटा दिया है. 1991 में नरसिंह राव की सरकार ने नयी आर्थिक नीति लागू की. 

 

भारत के जीवन में यह बड़ा मोड़ था. तब वामपंथी, भाजपाई इस नीति के खिलाफ खड़े हुए. पर वर्ष 1995 में विपक्ष के नेता की हैसियत से लालकृष्ण आडवाणी अमेरिका गये. वहां उन्होंने बयान दिया कि हमारी सरकार बनेगी, तो इस नयी अर्थनीति को और तत्परता-चुस्ती से लागू करेंगे. संसद में या देश की धरती पर उदारीकरण-नयी अर्थनीति का विरोध और अमेरिका की धरती पर समर्थन! 

 

उन्हीं दिनों ज्योति बसु-सोमनाथ चटर्जी की जोड़ी पूरी दुनिया में घूम-घूम कर बंगाल में विदेशी पूंजी निवेश के लिए एमओयू साइन कर रही थी, यह दल भी संसद में विदेशी पूंजी और नयी अर्थनीति का विरोध कर रहा था, पर बंगाल के लिए दुनिया घूम कर उसी पूंजी को झोली फैला कर मांग रहा था. यह कथनी-करनी का फर्क, विचारहीन दौर की राजनीति का सबसे सबसे प्रमुख लक्षण था. उन्हीं दिनों कर्नाटक में चुनाव हो रहे थे. एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व में जनता दल चुनाव लड़ रहा था. 

 

जनता दल ने नयी अर्थनीति के उग्रविरोध को उस चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बनाया. जनता दल भारी बहुमत से जीता. चुनाव जीतते ही दूसरे दिन श्री देवगौड़ा सीआइआइ की बैठक में बोलने कलकत्ता पहुंच गये. वहां उन्होंने घोषणा की कि नयी अर्थनीति को लागू करना मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता है. चुनाव जीतने के 24 घंटों के अंदर यह कलाबाजी. वैचारिक परिवर्त्तन. फिर वह उसी महीने दावोस गये. नयी अर्थनीति समझने.

 

इसके बाद केंद्र में संयुक्त मोरचा-वाम मोरचा की सरकारें बनीं. एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल क्रमश: प्रधानमंत्री हुए. डब्ल्यूटीओ पर साइन करने से लेकर नयी अर्थनीति को आगे बढ़ाने की हर संभव कोशिश दोनों प्रधानमंत्रियों की सरकारों ने की. इसके बाद सत्ता में आया स्वदेशी का राग अलापनेवाला भाजपा गंठबंधन. नयी अर्थनीति के बल पर 'इंडिया शाइनिंग' गाते-गाते एनडीए सत्ताच्युत हो गया.

 

अब यूपीए की सरकार है. हाल में पेटेंट बिल वामपंथियों के सहयोग से पास हुआ है. जब एनडीए सत्ता में था, तब उसने यह बिल तैयार किया था. अब वह इसी पेटेंट के विरोध में है. यही इस दौर की राजनीति की खूबी है. सत्ता में रहते हुए कुछ और कहना, सत्ता के बाहर जाकर उसके ठीक विपरीत आचरण. चाहे नयी अर्थनीति-उदारीकरण का सवाल हो या डब्ल्यूटीओ का या पेटेंट का या विदेशी पूंजी निवेश का, गुजरे 15 वर्षों में सारे दलों के चेहरे और चरित्र इन मुद्दों ने उजागर कर दिये हैं. 

 

सत्ता में रह कर इन मुद्दों का समर्थन, बाहर जाकर विरोध. अब बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य को  बंगाल का 'देंग सियाओ पिंग' (चीन के मशहूर नेता, जिन्होंने चीन को बाजार व्यवस्था की पटरी पर डाला) कहा जा रहा है. सवाल यह नहीं है  है कि ये नीतियां सही हैं या गलत, बल्कि कैसे सारे दल वैचारिक रूप से दरिद्र हो गये हैं. इन नीतियों के विकल्प में इन दलों की अपनी कोई नीति नहीं है.

 

इसलिए लगभग सारे दल उदारीकरण, बाजार व्यवस्था और उपभोक्तावाद के दर्शन से संचालित हो रहे हैं. खूबी यह है कि सत्ता में जाते ही ये दल इन नीतियों का समर्थन करते हैं और बाहर होते ही विरोध. राजनीतिक दल,  जनता से इस तरह खुलेआम दोहरा आचरण करें, झूठ बोलें. 20 वर्षों पहले की राजनीति में यह संभव नहीं था. यह दलों के वैचारिक चारित्रिक पतन का परिणाम है.इस दर्शन ने दो भारत गढ़ दिये हैं. 

 

जनवरी 2005 के टाइम  पत्रिका ने भारत पर प्रकाशित अपने एक महत्वपूर्ण लेख में कहा कि अब भारत दो है. 35 फीसदी भारतीय गरीबी में बिलख रहे हैं और लगभग दस लाख अति समृद्ध भारतीय हैं. ये समृद्धि-भौतिकता का चरम भोग रहे हैं. इन्हें अपनी असली आमद और अपनी कुल संपदा किसी को बताने की परवाह नहीं है. गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले भारतीय प्रतिदिन एक डालर से कम कमाते हैं. लगातार अनुत्पादक खर्च बढ़ रहा है.

 

पर सामाजिक, आर्थिक विषमता के ऐसे सवाल या गैंगरीन बन चुके भ्रष्टाचार के सवाल अब न संसद में उठते हैं, न दलों के भीतर. क्योंकि विचारधारा, दर्शन और संस्कृति के स्तर पर लगभग सभी शासक दल मामूली फर्क के साथ एक जैसा ही बर्ताव कर रहे हैं.

 

इस स्थिति में सर्वोदय के भाष्यकार दादा धर्माधिकारी याद आते हैं. वह अक्सर कहा करते थे. संसार-सृष्टि जिस रूप में हमारे सामने हैं, उसे जानने-समझने की कोशिश दार्शनिक ने की. वैज्ञानिक ने प्रकृति के नियमों को ढ़ूंढा, परंतु दुनिया को बदलने का काम, न तो दार्शनिक ने किया और न वैज्ञानिक ने. अर्थशास्त्री भी यह काम नहीं कर सके. जिन लोगों ने समाज-देश बदलने का काम हाथ में लिया है. वे न तो दार्शनिक हैं, न वैज्ञानिक, न अर्थशास्त्री.

 

इतिहास भरा पड़ा है कि कैसे विचारों, सिद्धांतों, मुद्दों ने बहस, बदलाव, विरोध, क्रांति और युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार किये हैं. देश- समाज की यथास्थिति को अच्छे या बुरे बदलाव के लिए, महान दार्शनिकों, चिंतकों, क्रांतिकारियों, द्रष्टाओं के विचारों-सिद्धातों ने जमीन तैयार की है. आइडियाज (विचार) ने सभ्यता, व्यवस्था और साम्राज्यों की चूलें हिला दी हैं. आज बर्बर युग, पत्थर युग से होते कृषि युग, औद्योगिक क्रांति के रास्ते सूचना क्रांति-ग्लोबल विलेज तक दुनिया पहुंची है, तो इस यात्रा में विचारों, वादों, मूल्यों का बड़ा योगदान रहा है.

 

पर ग्लोबल होती इस दुनिया के नये विचार और सिद्धांत क्या हैं? किस वसूलों-विचारों, सिद्धांतों के ईद-गिर्द समूह-समाज, देश या लोग गोलबंद हो रहे हैं!  किस विचार में वह ताकत-आकर्षण है, जिसके प्रभाव में करोड़ों लोग बेहतर भविष्य बनाने के लिए निकल पड़े? फिलहाल आकर्षण का केंद्र है, बाजारवाद और इसके चिंतक, प्रबंधन के बड़े जानकार-भाष्यकार. बाजार के माध्यम से दुनिया की व्याख्या की नयी कोशिश हो रही है. पर बाजार हमेशा मुनाफा देखता है, और यह मनुष्य की भावनाओं के प्रति न्यूट्रल है, संवेदनहीन है. पर सच यही है कि बाजार एजेंडा तय कर रहा है. भारत के अनुभव को याद करें. 1991 के उदारीकरण के बाद सीआईआई, उद्योग फोरमो, चैंबर ऑफ कॉमर्स के मंचों से प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, मुख्यमंत्री अन्य महत्वपूर्ण मंत्री नीतियों की घोषणाएं करते हैं.

लोकतंत्र से चुने गये और सरकार में बड़े पदों पर जनप्रतिनिधि के रूप में बैठे. इन लोगों में स्पर्द्धा रहती है कि किस उद्योग मंच पर कौन पहुंच रहा है? 1970 तक उद्योग नीति-अर्थनीति 'गरीबों' को फोकस में रखकर बनती थी. संसद में इन नीतियों-पंचवर्षीय योजनाओं पर बहस होती थी. उन्हीं दिनों योजना आयोग के एक सदस्य प्रो मिन्हास ने गरीबी रेखा से नीचे रहनेवालों की मान्य-स्वीकृति परिभाषा पर ही सवाल खड़ा कर दिया. उन दिनों की राजनीति में यह मुद्दा बड़ा गंभीर और चर्चित हो गया. प्रधानमंत्री इंदिराजी के लिए संकट पैदा करने वाला सवाल. संसद से सड़क तक यह मुद्दा उठा. आज अर्थनीतियों की चर्चा सीआईआई और ऐसे फोरमों पर होती है, कारपोरेट हाउसों के हित-अहित में, क्योंकि बाजार उनके हाथ में हैं. इस अफसाने में 'कामन मैन' (साधारण आदमी) कहां है?

 

इस बाजार दर्शन-व्यवस्था की वाहक हैं, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, मैकडोनाल्ड जैसे फूड चेन. दुनिया के 121 देशों में 30,000 मैकडोनाल्ड के रेस्टूरेंट हैं. साढ़े चार करोड़ ग्राहकों को रोज खिलाते हैं. ये रेस्टोरेंट 'अमेरिकन कंज्यूमर लाइफ स्टाइल' और ड्रीम बेचते हैं. इसका फ्लेवर (गंध) स्थानीय है. ग्लोबलाइजेशन की छतरी के नीचे लोकलाइजेशन. आत्मा अमेरिकी, बाहरी ढांचा यानी इंप्लाइ (काम करनेवाले) लोकल. अमेरिकी हैंबरगर, इटेलियन पिज्जा, फ्रेंच व्यंजनों के साथ कुछ-कुछ भारतीय व्यंजनों की गंध भी है. चीन में मैकडोनाल्ड का सबसे बड़ा रेस्टूरेंट है, 700 लोगों के एक साथ- एक जगह बैठने की जगह 27 काउंटर हैं. जिस दिन 1992 में बीजिंग में मैकडोनाल्ड रेस्टूरेंट खुला, 40,000 चीनी आये. उन्होंने टिप्पणी की कि यहां आकर समता का बोध हुआ. फ्रांस की क्रांति से जो समता शब्द निकला, साम्यवादी चीन में उसका एहसास मैकडोनाल्ड जाकर चीनियों ने किया. माओ की क्रांति के पांच दशक बाद. विचार अनुभूति और सीखने-सिखाने के नये केंद्र हैं, आइडिया हाऊस हैं, ऐसे केंद्र. मैकडोनाल्ड का दावा है कि हम पारिवारिक मूल्य-संस्कार के बीज बोते हैं. 'गोल्डेन आचज ईस्ट'  के लेखक कहते हैं कि पूर्व एशिया के अनेक देशों में बच्चों-युवाओं ने 'जन्मदिन के उत्सव समारोह' की सीख मैकडोनाल्ड से ली. इन देशों के बच्चे यहां जन्मदिन नहीं मनाने पर अपने अभिभावकों से ही कु˜र्सी करते हैं. 

 

इन दुकानों पर लाइन लगाकर आप खरीद सकते हैं. इस तरह इनका दावा है कि कतारबद्ध होने का अनुशासन सिखा कर हम 'लॉ एंड आर्डर' की संस्कृति मजबूत करते हैं. ग्लोबल दुनिया में 'यूनिटी इन डाइवरसिटी' (अनेकता में एकता) का काम हम करते हैं, ऐसा इनका दावा है, शाकाहारी जैनी से लेकर घोर मांसाहारी, श्वेत, अश्वेत, यहूदी, ईसाई, हिंदू, मुसलमान सब एक छत के नीचे, इसलिए मैकडोनाल्ड का नारा है फ्रेंच फ्राइज फ्रिक्स ऑफ द वर्ल्ड, यूनाइट! (दुनिया की तरंग मौज मस्ती को एक जगह फ्राइ कर अनुभव लेने के लिए एकजुट हों)

 

कभी नारा लगा था 'दुनिया के गरीबों एक हो' इससे समाजवाद, साम्यवाद और समतापूर्ण समाज के सपने जगे, अब मैकडोनाल्ड जैसी सैकड़ों बहुराष्ट्रीय कंपनियां, जिस बाजारवाद की छत्रछाया में सपने जगा रही हैं, उनसे कौन सा वाद, विचार या सपने पैदा होंगे, इसकी प्रतीक्षा है.