दक्षिण अफ्रीका में - 3 : 'मंडेला' से 'मदीबा' की कहानी, मुक्त होते ही मुसीबतों से घिरे!

दक्षिण अफ्रीका में - 3 : 'मंडेला' से 'मदीबा' की कहानी, मुक्त होते ही मुसीबतों से घिरे!
- हरिवंश - 
 
नेल्सन मंडेला, जिन्हें श्वेत शासकों ने साढ़े सत्ताइस वर्षों  तक एकांत तनहाई में रखा. यातनाएं देते हए. केपटाउन के जिस रोबेन आइसलैंड के किला जेल में उन्हें 18 वर्षों  से अधिक तनहा रखा गया, वह आज 'मिथ' मन गया है. मनुष्य के संकल्प, आत्मबल  और मानवीय क्षमता का. बड़ी संख्या में दुनिया के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं. वहां से उन्हें पालसमूर जेल ले जाया गया. 
 
वह भी, केपटाउन के दक्षिण-पूरब में पास ही है. मंडेला ने अपने संस्मरण में लिखा है, केपटाउन, जो तीन दशकों से मेरा घर रहा, 'उसी केपटाउन के लोगों से, जेल से साढ़े सत्ताइस वर्षों  बाद मुक्त हो कर पहली बार मैं मिलूंगा. भाषण दूंगा. केपटाउन के ग्रैंड परेड मैदान में'. यह एहसास और बोध ही रोमांचकारी था. सचमुच जो 'पीर पराई' (दूसरों की पीड़ा -आजादी की कीमत) जानता है, वही इस भाव, बेचैनी और मानस को समझेगा. साढ़े सत्ताइस वर्षों  की तनहाई के बाद अपने लोगों के बीच होना.
 
इसी धरती पर आजाद हो कर मंडेला कई दशकों बाद सार्वजनिक सभा में आये थे. उन दिनों के उनके संस्मरण छूने वाले, मार्मिक और ऊर्जावान हैं. 10,000 से अधिक दिनों तक जेल में रह कर मंडेला बाहर आये.  जेल से सीधे सभास्थल जाना था. पर दुनिया और अफ्रीकी, इस अदभुत इंसान को देखने, उस दिन केपटाउन में उमड़ पड़े थे. मनुष्य की जिजीविषा की जीत का यह दिन, मानवीय इतिहास की धरोहर है. सुरक्षा व्यवस्था चौपट होनी ही थी. 
 
उन्हें पूर्व तय रास्ते से न ले जा कर, गली-कूचों और अन्य रास्तों से सभास्थल ले जाने की कोशिश हई. देहाती इलाके से. स्थानीय रेडियो ने सूचना दे दी कि अपार भीड़ के कारण, मंडेला को दूर देहाती इलाकों के रास्ते से सभास्थल लाया जा रहा है. यह सूचना पाकर ग्रामीण इलाकों में भी लोग सड़कों पर खड़े हो गये. मंडेला ने अपनी आत्मकथा में लिखा है.
 
'देहाती इलाके हरे भरे थे... पर मेरे लिए आश्‍चर्य की बात थी कि अनेक गोरे परिवार, हमारी झलक पाने के लिए सड़कों के किनारे खड़े थे.. मैं स्तंभित था. इस गोरे इलाके से मिले समर्थन ने मुझे अत्यंत  प्रोत्साहित किया.  एक जगह मैंने गाड़ी रुकवा दी. कार से बाहर निकला और एक गोरे परिवार के बीच चला गया. मैं उन्हें यह बताना चाहता था कि उनके समर्थन ने मुझे अद्भुत ढंग से प्रेरित किया है. इस घटना ने मुझे यह सोचने पर विवश कर दिया कि जिस दक्षिण अफ्रीका को साढ़े सत्ताइस वर्षों  पहले छोड़ कर मैं जेल गया था,  वह काफी बदल गया है.' यह असाधारण घटना है.
 
जिन गोरे लोगों की रंगभेद नीति के खिलाफ 44 वर्षीय मंडेला जेल गये. 71 की उम्र में रिहा हए. भयावह यातना, मानसिक पीड़ा, एकांतवास, संकल्प और मनोबल तोड़ने के जेल के दिन, जिन गोरों के कारण मंडेला को देखने पड़े, पग-पग और पल-पल मौत से रूबरू होना पड़ा, जिनके अनेक प्रिय कामरेड क्रूरता में मार डाले गये, जिनके परिवारों को भयावह यातनाएं दी गयीं. 
 
वह व्यक्ति, जेल से रिहा होकर सबसे पहले गोरों से मिला. आभार प्रकट किया. और दक्षिण अफ्रीका को साथ मिल कर बनाने का संकल्प किया. न निजी कटुता, न बदले की आग, न अहंकार, न द्वेष. न अतीत की पीड़ा, न भोगी व्यथा, जलालत और नफरत की अभिव्यक्ति.
 
मंडेला, सचमुच ' मदीबा'  (महात्मा, सरदार, लोकनायक  जैसी अफ्रीकन जन उपाधि. इसी नाम से मंडेला पुकारे जाते हैं.) में  तब्दील हो चुके थे. यह बदलाव बुद्ध, ईसा, गांधी (कट्टर शत्रुओं को माफ करना) जैसे सहस्राब्दियों में पैदा होनेवाले इंसानों में ही होता है. उसी परंपरा की कड़ी में एक इंसान आज भी धरती पर है.
 
जेल से छूटने के बाद लगातार 2-3 वर्षों  तक देश के कोने-कोने में जा कर मंडेला, नया दक्षिण अफ्रीका बनाने की बात करते रहे. काले, गोरे और इंडियन समेत सबकी सहभागिता, सहयोग और  साझेदारी से. सबके सपनों का देश. पर बाहर आ कर भी मंडेला मुसीबतों के पहाड़ से घिर गये. अपनों और गैरों दोनों से! पर इन दोनों स्तरों पर चुनौतियों को जिस तरह उन्होंने झेला और राह दिखायी, उसने उन्हें इतिहास पुरुष बना दिया.
 
दिनांक : 19-06-07