स्वीडन यात्रा : सवाल भारत के, चिंता यूरोप में!

स्वीडन यात्रा : सवाल भारत के, चिंता यूरोप में!

- हरिवंश -

स्वीडन सुंदर है. पर स्वीडन में स्टॉकहोम (राजधानी) का ही नाम सुना था. ओल्फ पामे (पूर्व प्रधानमंत्री) के नाम से परिचित था. बोफोर्स तोप सौदेबाजी में स्वीडन (जहां यह बना था) भारत का घरेलू नाम बन गया था. 

बगैर सुरक्षा कैसे यूरोप के राष्ट्राध्यक्ष रहते हैं, इस सिलसिले में भी ओल्फ पामे और स्वीडन चर्चित हुए थे. स्टॉकहोम के एक मोहल्ले में बिना सुरक्षा के ओल्फ पामे चहलकदमी कर रहे थे, जब उन पर हमला हुआ. इसलिए इच्छा थी, राजधानी (स्टॉकहोम) देखने की. हर देश की राजधानी, अपनी संस्कृति-व्यवस्था और मूल्यों की प्रतिबिंब होती है. पर जाना था, गोथेनबर्ग. अवसर था, वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूजपेपर्स की बैठक. चार दिनों तक. और यह शहर स्वीडन के दक्षिण छोर पर समुद्र के किनारे था. 

डेनमार्क देश के उत्तरी छोर पर. समुद्री जहाज से तीन घंटे की यात्रा. स्टॉकहोम, गोथेनबर्ग से उत्तर-पूर्व के एक छोर पर है. वायुयान से घंटे भर की यात्रा. हमारा गंतव्य हेलसिंकी (फिनलैंड) से सीधे गोथेनबर्ग था. और लौटना भी इसी रास्ते. इसलिए स्टॉकहोम जाना नहीं हुआ.

उत्तरी यूरोप की यह पहली यात्रा थी. गोथेनबर्ग में सूर्यास्त रात 9.45 पर होता है. सूर्योदय सुबह 4.30 बजे (यह स्वीडन का स्थानीय समय है). उत्तरी धु्रव के पास के देशों में से है, स्वीडन भी. भारत के समय से यहां 3.30 घंटे पीछे है, समयचक्र. गोथेनवर्ग का आर्किटेक्चर (शिल्प) यूरोप के अन्य देशों से मिलता-जुलता है. यहां शहरीकरण की प्रक्रिया भिन्न रही है. 

आमतौर से शहर, संस्कृति के प्रतिबिंब बने, यह प्रक्रिया यूरोप में कई सौ वर्षों से चल रही है. नगरीकरण (अरबनाइजेशन) महज स्थूल अवधारणा नहीं है यूरोप में. मसलन भारत में, शहरीकरण का अर्थ है अनार्की, भीड़भाड़, ट्र्रैफिक जाम, कंक्रीटों के जंगल (मल्टीस्टोरी बिल्डिंग), पानी संकट, पार्किंग संकट, स्लमों का उदय... वगैरह-वगैरह. भारत में यह काम किसके हाथ है? 

सरकारी अफसरों, ठेकेदारों, राजनेताओं, जमीन दलालों वगैरह के हाथ. जवाहरलाल अरबन डेवलपमेंट फंड में कितनी लूट हो, इसका षडयंत्र रचनेवालों के हाथ. हरियाली, पेड़-पौधों को तबाह कर देनेवालों के हाथ. प्रकृति को पूंजी में तब्दील कर देनेवाले कलाबाजों के हाथ. लेक (झील), तालाब, पार्क, मैदान, खाली जगहों के सौदागरों के हाथ.

इसके ठीक उलट यूरोप की परंपरा रही है. सिटी (शहरीकरण) का वहां अर्थ पाया, संस्कृति का प्रतिबिंब स्थल. अनेक बड़ी-छोटी लाइब्रेरियों का जाल. बड़ी लाइब्रेरियां, सरकारी फंड से. सुंदर और खुले पार्क. आज से 20-25 वर्ष बाद की चुनौतियों के अनुरूप शहर का विस्तार और विकास. 

सड़कों की चौड़ाई. वाहनों का अनुमान और तदनुरूप व्यवस्था. घरों-बिल्डिंगों के नक्शे, रंग- रोगन में तारतम्य. हर शहर में इतिहास के जीवित प्रसंग, स्मारक के रूप में हैं. साफ-सुंदर और भीड़ भरे. अपने-अपने शहरों के धरोहर, ऐतिहासिक गौरव के प्रति सम्मान. दंभ भी. बैले, सिनेमा, मशहूर ओपेरा. तरह-तरह के रेस्टोरेंट. पार्कों में गीत, संगीत, प्रवचन. 

हर शहर अपने यहां के 'सेंटर ऑफ एक्सेलेंस'(सर्वोच्च, सर्वश्रेष्ठ बौद्धिक संस्थाएं) पर नाज करता है. उसका गौरव बढ़े, इसके लिए सचेत रहता है. बौद्धिकों, इतिहासकारों और संस्कृतिकर्मियों की विशेष भूमिका रही है, यूरोप के शहरों को गढ़ने में. पग-पग पर नृत्य, संगीत और बौद्धिक बहस की यह संस्कृति गोथेनबर्ग में भी है.

पेरिस के कहवा घर (काफी हाउस), सार्त्र, कामू वगैरह का दौर. ब्रिटेन में डिसेंट (मतांतर) की परंपरा.

कभी डॉ लोहिया ने कलकत्ता, दिल्ली, इलाहाबाद, लखनऊ, पटना वगैरह के काफी हाउसों में यह बौद्धिक झलक देखी थी. क्या संयोग है कि भारत में काफी हाउसों की यह परंपरा (जिसने एक समय में यहां की राजनीति को प्रभावित किया) खत्म हो चुकी है. काफी हाउस बंद हो गये. इनकी जगह ले ली है, पांच सितारा होटलों ने. सत्ता के असली दलाल, जो सचमुच भारत की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं, अब पांच सितारा होटलों में अड्डा जमाते हैं.

पर यूरोप की यह परंपरा अभी है. इसी परंपरा स्त्रोत से समाज के असली सवाल निकलते हैं. सार्वजनिक बहस का विषय बनते हैं. फिलहाल गोथेनवर्ग समेत यूरोप में सार्वजनिक बहस के तीन मुद्दे हैं. (1) खाद्यान्न संकट, (2) मौसम में बदलाव और (3) ऊर्जा. राजनीति, मीडिया, विश्वविद्यालय, सार्वजनिक जीवन सब में.

सोचता हूं, इन तीनों सवालों से सबसे आक्रांत तो भारत है. पर भारत के सार्वजनिक जीवन, राजनीति और विश्वविद्यालय-कॉलेजों में इन सवालों पर चिंता और चेतना?

भारत पहुंचने पर छह जून के 'टाइम्स ऑफ इंडिया' (मुंबई) में पढ़ा. इस बार मशहूर जुहू समुद्र तट पर पांच जून को दोपहर बाद अचानक 4.86 मीटर ऊंची लहरें उठीं. अप्रत्याशित और डरावनी. आधे घंटे के लिए तट पर बसे घर घुटने भर पानी से भर गये. विशेषज्ञ कहते हैं, यह भावी विनाश की झलक है. गौरवमयी कृति कामायनी (जयशंकर प्रसाद) की आरंभिक पंक्तियां याद आती हैं.

जल प्रलय, तेल प्रलय, खाद्यान्न प्रलय की आशंका पर यूरोप में जबरदस्त जागरुकता, बहस और चिंता है. पर भारत में? भारत के शहरों में? शायद यहां शहरों की बुनियाद ही गलत पड़ी और पड़ रही है, इसलिए समाज, देश और जनता में अपने सामने खड़ी चुनौतियों के प्रति तटस्थ भाव है. 5 जून के ही इंटरनेशनल हेरल्ड ट्रिब्यून (दुनिया के प्रतिष्ठित आखबारों में से एक) में पढ़ा भी, एशिया के दो देश इन सवालों से सबसे अधिक प्रभावित हैं, भारत और मलयेशिया.

दिनांक : 08-06-08